Saturday, November 17, 2018

खोए हुए साज़

मैं खोए हुए साज़ को भी चुरा लाऊँगा,
जो टूट गए हैं जाने-अनजाने में, मैं उन्हें भी सजा लाऊँगा,
माना की हमसे गलतियां हुई हैं राह-ए-सफऱ में ,
जो अपने रूठ गए हैं हमसे, मैं उन्हेँ भी मना लाऊँगा। 

Monday, November 12, 2018

अब इतनी तन्हाँ

जिन्दगी अब इतनी तन्हाँ हो गई हैं कि ,
अब तो होती बारिश भी 
मुझे देख कर रूक जाती है |

यूँ न बोलिये

इस क़दर यूँ न बोलिये कि दगा हो जाये,
सजदे में रहें हम और सजा हो जाये,
हम कहीं खो न जाए उस पल में इतना कि,
मेरा कल मुझसे बेवफा हो जाये ।

तारीख़-ए-अदब

लो हमने भी बदल दी तारीख़-ए-अदब,
वफा के नाम पर लोग ,
दग़ा दे रहे हैं ।

भुल कर हमें

भुल कर हमें वो किधर जा रही हैं ?
जमाने की तलब से अब उन्हें भी शर्म आ रही है ।

हैं भाव

वो जो खाते हैं भाव, 
क्या उनसे भर जाते हैं जल्दी घाव ?

वो याद

वो याद अब धुंधला सा हो गया है, 
जो तेरी याद में आते थे ।

ये जो इल्जाम

ये जो इल्जाम लगाया है मुझ पर,
कोई बताएं मुझे कि 
ये वफा के हैं या फिर द़गा के ?

ईक कमी पुरी

तेरे चले जाने से भी ईक कमी पुरी हुई है, 
अब जाके खुद से मिला हूँ तो तस्सली हुई है ।

वो दर्द

वो दर्द न समझे खामोशी का,
और हम मुस्कुराना न छोड़ सके ।

वो खबर

वो खबर अब साज बन गई हैं, 
जो कमी थी अब आवाज बन गई है ।

कभी उनकी हसरत

कभी उनकी हसरत थी कि हम कब्र बने,
जब पूरी हूई उनकी हसरत तो ,
वो अपनी हसरत भूल गए।

मेरे अलफ़ाज

मेरे अलफ़ाज कुछ इस कदर के होते हैं, 
अपने अनजान, 
और बेगाने सब समझते हैं ।

करवट बदल

वो रूठ कर हमसे,
मेरे सामने से रास्ते बदल लिए, 
फिर, फिर क्या ?
हम भी सोते रहे और
करवट बदल लिए ।

महफिल-ए-मैखाने

सारी निगाहें फिर हमें ही खोजने लगे, 
जब महफिल-ए-मैखाने में बैठ कर हमने, 
मदिरा को शरबत कहा ।

रिवायतों कि साजिश

हमारी कोशिशे उस दिन विफल हो गई, 
जब हम उन्हें समझाने में रह गए,
और वो रिवायतों कि साजिश में लग गए ।

अपनी मंज़िल

मेरी शिकषत को वो अपनी मंज़िल बना बैठे हैं,
और उन्हें पता ही नहीं है की,
हमारे पास गँवाने को कुछ भी नहीं है।

ऐसे परिंदे

मेरी रियायत में भी कुछ ऐसे परिंदे हैं, 
चाहे कुछ भी हो जाए,
पर रहते अपने हैं।

नफरत भरी निगाह

यूँ नफरत भरी निगाह से मत देख मुझे, 
हमने सुना है कि अक्सर,
प्यार हो जाता है गुस्सा के बाद ।

हमसे बिछड़

हम दर्द भी हैं, हम मर्ज भी हैं, 
ज़रा हमसे बिछड़ के तो देखिए, 
मालुम होगा कितने खुदगर्ज भी हैं ।

इश्क़ को मिटाने

वो दिल को जलाने में लग गए हैं,
हम उनको मनाने में लग गए हैं,
जब बात वफ़ाक़त की आयी तो,
सब इश्क़ को मिटाने में लग गए हैं।

दीद के भी क़ाबिल

हम तोड़ लिए जाते हैं सजाने को,
कस्मे-वादे निभाने को,
वो दीद के भी क़ाबिल न हम बन सकें,
जो याद आते हैं ज़माने को।

फिर वो दिलनशी

वो आदत तो तब बन गए,
जब वो किसी और के हो गए,
अच्छी भली ज़िन्दगी चल रही थी,
और फिर वो दिलनशी बन गए।

अक्सर चुप

सुना है कि वो खामोशियों को पढ़ लेते हैं, 
इसलिए हम अक्सर चुप रहते हैं ।

उनकी हसरत

उनकी हसरत अपनी अदा बिखेर रही थी, 
जुबां से न और मन से पता नहीं क्या कह रही थी ?

लाखों जख्म

मैं बस एक नज्म पढ़ता हूँ, 
और उसमें लाखों जख्म कहता हूँ।

Saturday, November 10, 2018

मेरे फ़र्ज

मैं दर्द भी लिखता हूँ, मैं मर्ज भी लिखता हूँ,
हवाओँ का रुख देखकर फ़र्ज भी लिखता हूँ,
वो अजनबी हैं हमारे पैमानों से,
मैं अपनों के लिये तर्ज हूँ ।

Tuesday, October 30, 2018

वो दर्द

वो दर्द न समझे खामोशी का,
और हम मुस्कुराना न छोड़ सके ।

तस्सली

तेरे चले जाने से भी,
ईक कमी पुरी हुई है, 
अब जाके खुद से मिला हूँ,
तो तस्सली हुई है ।

Saturday, October 13, 2018

तेरा प्यार

तेरा प्यार तेरा हर किस्सा याद है,
तेरा वफ़ा तेरा चेहरा याद है,
तू भी बदल गया ये तेरा मुक्क़द्दर था,
मुझको तो तेरा हर ज़र्रा याद है। 

मेरी क़दर

मेरी क़दर तू भी करेगा,
ज़रा वक़्त को तो मना लूँ। 

घाव

वो जो खाते हैं भाव, 
क्या उनसे भर जाते हैं जल्दी घाव ?

तेरी याद

वो याद अब धुंधला सा हो गया है, 
जो तेरी याद में आते थे ।

इल्जाम

ये जो इल्जाम लगाया है मुझ पर,
कोई बताएं मुझे कि 
ये वफा के हैं या फिर द़गा के ?

Saturday, September 29, 2018

इक भेजा था पैग़ाम

इक भेजा था पैग़ाम,
उसका जवाब बाकी है,
मेरे दिल से जो निकली है,
उसकी आह बाकी है ,
वो जो कहते थे,
"हम तेरे दिल रहेंगे ",
अब तक,
अब तक वो ख्याल बाकी है।

Wednesday, September 19, 2018

इबादत

मैंने सजदा छोडी है, 
इबादत नहीं भूला,
जख्मी हूँ इसलिए चुप हूँ,
अभी तक गर्जना नहीं भूला ।

Monday, September 17, 2018

शर्म आ रही है |

भुल कर हमें वो किधर जा रही हैं ?
जमाने की तलब से अब उन्हें भी शर्म आ रही है |

हमारी वफा

हमारी वफा का मंज़र कुछ यूँ बिखर गया है,
वो ज़ार-ज़ार कर गए,
हम तार-तार रह गए ।  

Saturday, September 15, 2018

अपनी हुनर

अदब-ए-हिंद चंद नज्म पेश करता हूं...

शब्दों को जरिया बना कर,
चंद वाकया पेश करता हूँ, 
उनको यादों में रख कर,
अपनी हुनर पेश करता हूँ ।

मुझे बहुत रोना है ...

कभी-कभी मुझे बुरा लगता है,
जब मैंने आपको दूसरी तरफ देखा,

तुम मेरा प्यार नहीं था,
तुम मेरी जिंदगी हो,
जब आप मुझे अनदेखा करना शुरू करते हैं,

मुझे बहुत रोना है ...

तुम हॅसते बहोत हो।

तेरी बेवफाई के किस्से खूब सूने हैं मैंने,
कभी मेरा भी तो दिल तोड़ ,
लोग कहते हैं तुम हॅसते बहोत हो। ...

दुआ मुक़्क़मल

तुमने वफ़ा की जो चादर छढाई थी मजार पर,
क्या वो दुआ हुए आज तक मुक़्क़मल

ऐसा मेरा नसीब नहीं

तेरी क्या हिज़्ज़ारत करूँ ?
ये मेरे लफ़्ज़ों में नहीं..
शिक़वा और शकायत मैं करता नहीं,
और वफ़ा तू करें ऐसा मेरा नसीब नहीं...

मेरी गलती

क्या खूब थी मेरी भी गलतियां ?
मैंने तो बस वफ़ा की उम्मीद की थी .....

तू चली गयी छोड़ कर

तू चली गयी छोड़ कर ये तेरा फ़ैसला था,
तू लौट आये अब ये मेरे मुक्क़द्दर में नही....

तेरी और मेरी रास्तें

तेरी और मेरी रास्तें अब अलग हो गई हैं,
सुना है की तुम अब बेवफा हो गयी है...

तुम से बिछड़ अब खुश कौन है ?

तुम से बिछड़ अब खुश कौन है ?
ये तो तू भी जानती है...
ये तो मै भी जानता हूँ ....

तेरा दर्द भी अजीब हिसाब दे गया,

तेरा दर्द भी अजीब हिसाब दे गया,
तेरे चले जाने का एक एक जवाब दे गया..

रातों को अब नींद किसे आती है ?

रातों को अब नींद किसे आती है ?
जग कर ख़्वाब पूरे किसके होते हैं ?
उनसे कह नहीं पातें हैं अपने दिल के हालात,
वो जो समझ नहीं पाते उनके ज़ज़्बात कैसे हैं ?

ख्वाब पूरे किसके होते हैं ?

ख्वाब पूरे किसके होते हैं ?
राहों से केवल गुजर कर,
ख्यालात किसके पूरे होते हैं ?
वो मंज़िल जो आज अद्धूरी सी लगती है,
जिनके पुरे हो भी गए, तो
वो ज़माने को कैसे देखते हैं ?

शायद उनका ख्याल आया था ?

लबों से छूट कर जो एक हसीं निकली थी,
जाने किसकी याद में ये नमी निकला थी,
वो नहीं थे पास मेरे तब,
शायद उनका ख्याल आया था ?

खयालो से उप्पर अासमाँ निकला था,
चराग़ों को जला कर कोई रोशनी निकला था,
कोई धुंआ भी तो साथ था उनके उप्पर उप्पर,
जब निकला मेरा ज़नाज़ा उनके गली से,
तब जाके उनके लबो से मेरा नाम निकला था ?

Friday, September 14, 2018

एक बेवफा के घर को सजाने चला हूँ

अपने दिल की हसरत मिटने चला हूं ,
एक बेवफा के घर को सजाने चला हूँ ||

तेरी भी आँखे तो रोती होगी

तेरी भी आँखे तो रोती होगी,
जब तेरी यादों में मेरी बातें होती होगी,
अब और न गम करना तू कसम है मेरी,
जब तू रोयेगी तो रोयेगी ये आँखें भी मेरी ||

जब से तू बेवफा हो गया है

तुम से मेरा कल यूँहिं खफा हो गया  है,
हां , जब से तू बेवफा हो गया है ||

आज आज़ादी का दिन था ?

तुम मिले थे मुझे कहीं किसी मोड़ पर,
क्या वो ख्वाहिशो का दिन था ?
आज मेरी आँखों की जो चमका रही थी,
वो आज आज़ादी का दिन था ?


तेरी हर बात पर मेरा यूँ मुस्कुराना,
तबज़्ज़ो देना हर मुक़ाम को,
यूँ ही हर नजर की तलाश में,
हम भटकटें है हर शाम को ||

क्या , आज आज़ादी का दिन था ?

तुम किधर हो ?

राहें भी तेरी तलब के शिकार हो गए हैं,
कश्ती को भी लहरों की दरकार हो गए हैं,
कोई देख न ले तेरी ख्वाहिशों को ऐ हवा,
जरा उनसे पूछ के तो बता की,
तुम किधर हो ?

Thursday, September 13, 2018

तू मिला ही कब था ?

तेरी यादों में ऐसे गुम हैं,
की अब होश खो चुके हैं,
फिर याद आता है मझको ,
की तू मिला ही कब था ?

उनकी याद आज भी आती हैं |

वो लम्हों में कुछ इस क़दर खो से गए थे,
हम पीछे जो उनके साथ से जो रह गए थे,
एक ख्याल था मेरे पास उनका,
ये ख़याल हरदम मेरे दिल में सिमट से जो गए थे ||


जो पास नहीं अब मेरे है वो बस उनका साथ,
उनके आने की कब से बस हो रही है बात,
बीतें दिनों की ख्वाहिश अब धुंधली पर रही है,
अब बस इनके आने की बात हो रही है ||

Wednesday, September 12, 2018

ज़िन्दगी थी

मैं बेवस तन्हा अक़ेला था ,
हज़ारों के साथ फिर भी अक़ेला था |
ना कोई था साथ मेरे , जब तेरी याद थी ,
मै जिंदा था और वो मेरी जिंदिगी थी ||

साथ कब तक कोई रहता है ?
याद कब तक कोई रहता है ?
वो साथ थे मेरे जब थे अकेले ,
तेरी रूह को भी कोई और परवाह न था |

जब साथ थी तू मेरे तो ज़िंदग़ी ज़िंदा था ||

तेरी याद आज भी बाकी है ।

जुबाँ के दर्द में,
यूं सिमट से गए हैं ।
अपनो के होते हुए भी,
खुद के गले लगे हुए हैं ।।

आप कहाँ हैं ?

मैं ढूँढ़ रहा था रस्ते-निग़ाहेँ दर-बदर,
आप का निशाँ कहीं भी मिला नहीं,
कोई मंजिल हमसे छुपी नहीँ,
कोई मंज़र हमसे बचा नहीं |

सभी पूछ रहे थे, आप क्या ढूंढ़ रहें  हैं  ?
ये बेवसी किसकी है  ?
क्या बताएँ किसको बताएँ ?

ढूंढ़ रही है निग़ाहें जिसको वो बेक़रारी किसकी है  ?