चलो एक सफर में चलते हैं,
जहां मंजिल नहीं, तुम मेरे हमसफर बनो।
है गुज़ारिश कोई सुन तो ले,
राहों से मेरे सारे काँटे चुन तो ले,
ऐसे मरहम बन जाऊं मैं, उसके सुर्ख घावों पे,
कोई ज़ख़्म दस्तक़ देने से पहले सोच तो ले।।।
हमारी तबियत को कुछ इस तरह वो नासाज़ करती है,
निगाहें उठाकर ही सिर्फ क़ातिल क़त्लेआम करती है।।
ये रातें इतनी करवटे बदलने को मजबूर कर रही है,
किसी के पास होने को था, उसी से दूर कर रही है।।
मैं गुमनाम रहा तेरी गलियों से,
तू शौख मुजाहिर सपनों का,
तू चला गया, रुत चली गयी,
अब मौसम शोक ग़मगिनो का।।