मैंने ख्वाबों के जहाँ मे एक गुलिस्तां देखा है,
लगता है ज़मी पे आसमाँ देखा है,
तुम आये तो मैंने गुलिस्तां देखा है,
तुझमे ही मैंने सारा जहाँ देखा है।।
मैंने ख्वाबों के जहाँ मे एक गुलिस्तां देखा है,
लगता है ज़मी पे आसमाँ देखा है,
तुम आये तो मैंने गुलिस्तां देखा है,
तुझमे ही मैंने सारा जहाँ देखा है।।
मेरे तरन्नुम की ख़्वाहिश है कि ऐसा फलसफा हो तेरा,
बेदर्द बेग़ैरत जो भी अंजाम हो तेरा,
हम सफे पहली क़द में तुझे ऐलान करते मिलेंगे,
मजनू, रांझा, महिबाल जैसा गुलिस्तां हो तेरा।।
उफ़्फ़ ये दिक्कतें ये रुसवाई ये तन्हाई का मंज़र,
दिल के पास रहने वालों के ही हाथों में था खंज़र।।
बहुत खामखाँ उलझनों में रहा,
मैं खामखाँ उसे पाने की ज़द में रहा,
रुकसत, शिकायत, मज़लूम, सितारे,
कोई न हुआ मैं जब भी राह ए मुश्किल में रहा।।
कारक तो कहीं नहीं है खुद के भीतर,
इक इक राज है यहां सबके भीतर,
महक जाते हैं इतने जो लाज़मी लिबास हैं उनके,
और उसपे चार चांद लगाकर इतर।।
बहुत कुछ अल्फ़ाज़ इकर ए जयां नही हो पाता,
कितना भी कोशिस कर लो एहसास ए अंदाज़ बयां नही हो पाता,
हम हर मुफ़्लिश से उनको बचाते रहे, और
वो कुरेद कुरेद कर पुराने ज़ख़्म सुलगाते रहे।।
पतझड़ में जैसे पत्ते झड़ जाते हैं,
मतलब पूरे होने पे भी लोग बदल जाते हैं।
यूँही तमाम मुश्किलें आती रही ज़िन्दगी में,
मुश्किलें वही रही बस रास्तें बदल जाते हैं।।
बहुत बेवफा है मंज़र, काफ़ी बेरंग ज़माना है,
जो कहते थे ताउम्र साथ देंगे,
उन्होंने ही पहले दामन छोड़ा है।।
हम फिर भी गफ़लत में बाकी वादियों के चमन बन बैठे हैं,
जो बचे हैं रिश्तों में उन परिंदों का घरौंदा पुराना है।।
मैं उसे पाने की जद में रहा,
वो मेरा दिल दुखाने की ज़िद में रहा,
रहा कुछ यूं कि गर्दीशो में सितारा रहा,
अपनों के बीच में भी रह कर तमाम उमर बेसहारा रहा।।
एक तस्व्व्वुर एक ऐहतराम तेरा,
तुम्हारे तीर, दिल मेरा,
कर घायल मरहम खुद लगा दे,
कई ज़ख़्म और सब पे नाम तेरा।।।
मैं फ़ज्र इक मुलाक़ात चाहता हूँ,
आंखों में तेरी आफ़ताब चाहता हूँ,
चाहता और भी कुछ हूँ तमाम उलफ़्तों से तेरी,
फिलहाल तो इस तपती धूप में तेरी ज़ुल्फों का छाँव चाहता हूँ।।