बहुत खामखाँ उलझनों में रहा,
मैं खामखाँ उसे पाने की ज़द में रहा,
रुकसत, शिकायत, मज़लूम, सितारे,
कोई न हुआ मैं जब भी राह ए मुश्किल में रहा।।
बहुत खामखाँ उलझनों में रहा,
मैं खामखाँ उसे पाने की ज़द में रहा,
रुकसत, शिकायत, मज़लूम, सितारे,
कोई न हुआ मैं जब भी राह ए मुश्किल में रहा।।
कारक तो कहीं नहीं है खुद के भीतर,
इक इक राज है यहां सबके भीतर,
महक जाते हैं इतने जो लाज़मी लिबास हैं उनके,
और उसपे चार चांद लगाकर इतर।।
बहुत कुछ अल्फ़ाज़ इकर ए जयां नही हो पाता,
कितना भी कोशिस कर लो एहसास ए अंदाज़ बयां नही हो पाता,
हम हर मुफ़्लिश से उनको बचाते रहे, और
वो कुरेद कुरेद कर पुराने ज़ख़्म सुलगाते रहे।।