मुद्दा बहोत मिलेंगे तुम्हें मंज़िल से भटकाने को,
तुम पहाड़ बनकर डटे रहना,
जबतक बन न जाओ नर्मदा का कंकड़,
तुम कैलाश बनकर जमे रहना।।
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मुद्दा बहोत मिलेंगे तुम्हें मंज़िल से भटकाने को,
तुम पहाड़ बनकर डटे रहना,
जबतक बन न जाओ नर्मदा का कंकड़,
तुम कैलाश बनकर जमे रहना।।
तुम दरिया बनो, मैं डूब जाऊँगा,
आसु बनके आँखों से बह जाऊंगा,
तुम बसा लेना फिर से इस तसवीर को,
मैं बनता ही घर, बिखर जाऊंगा.
एक अरसा जैसे बीत गया हो,
पानी आंखों से सूख गया हो,
तुम गए जैसे बनकर हवा,
हाथ से रेत जैसे फिसल गया हो,
एक अरसा जैसे बीत गया हो।।
मैंने ख्वाबों के जहाँ मे एक गुलिस्तां देखा है,
लगता है ज़मी पे आसमाँ देखा है,
तुम आये तो मैंने गुलिस्तां देखा है,
तुझमे ही मैंने सारा जहाँ देखा है।।
मेरे तरन्नुम की ख़्वाहिश है कि ऐसा फलसफा हो तेरा,
बेदर्द बेग़ैरत जो भी अंजाम हो तेरा,
हम सफे पहली क़द में तुझे ऐलान करते मिलेंगे,
मजनू, रांझा, महिबाल जैसा गुलिस्तां हो तेरा।।