मैंने बाहें फैलायी और उसे दिया,
इक क़तरा आँसूं का फिर कभी न आने दिया ||
मैं कहूँ आफ़ताब तुम हक़ीक़त हो मेरी,
जब कुछ नही हो, तब भी जरूरत हो मेरी।
मेरी आँखों मे क्या तुम्हें सच नहीं दिखतें,
फिर क्यों ताकतें हो सर्द राहें मेरी।।
खफ़ा होकर जब जुदा कर दिया,
बिन कहे ही उसने सब कह दिया,
मैं क्या था, क्या उसके निशां,
ये गैरों से तुमने क्या कह दिया।।
हसरतें यूँ मिट गई तुम्हें पाने की तमन्ना में,
मैं मुद्दतों बाद सोया उसे खोने के बाद।।