महफ़िलें आज भी उदास हैं,
खोया जो हीरा लाजवाब है।।
उन्हें शिक़ायत है हमसे, हम बातें बेज़ुबान करते हैं,
किस शब्द को लिखूँ उनकी खिदमत में,
ये बार बार सवाल करते हैं।।
मैं कोशिशें लगातार करता हूँ,
उनसे उलफ़त निगाहें चार न हों,
चार दिन की ज़िंदगी है मुसाफिर,
कभी उनकी हार न हो, कभी हमारी हार न हो।।
इक ख्वाब में देखा तुझको,
आईने में खुद को सँवार लिया,
मिले इतने झख़्म राहें मोहब्बत में,
मैने उस गली में ही जाना छोड़ दिया।।
फ़क़त आरजू हशरत तुम्हें पाने की,
अये बेवफा,
तेरी बारात से ज़्यादा चर्चें होंगे,
हमारे ज़नाज़े की।।
हमसे ख़फ़ा हो तो क्या हो, जब रुखसार ए ग़म झलक जाए,
निगाहें झुकी, फिर उठी, फिर झुके तो पलकें झपक जाए।