हमारी तबियत को कुछ इस तरह वो नासाज़ करती है,
निगाहें उठाकर ही सिर्फ क़ातिल क़त्लेआम करती है।।
हमारी तबियत को कुछ इस तरह वो नासाज़ करती है,
निगाहें उठाकर ही सिर्फ क़ातिल क़त्लेआम करती है।।
ये रातें इतनी करवटे बदलने को मजबूर कर रही है,
किसी के पास होने को था, उसी से दूर कर रही है।।