लबों से छूट कर जो एक हसीं निकली थी,
जाने किसकी याद में ये नमी निकला थी,
वो नहीं थे पास मेरे तब,
शायद उनका ख्याल आया था ?
खयालो से उप्पर अासमाँ निकला था,
चराग़ों को जला कर कोई रोशनी निकला था,
कोई धुंआ भी तो साथ था उनके उप्पर उप्पर,
जब निकला मेरा ज़नाज़ा उनके गली से,
तब जाके उनके लबो से मेरा नाम निकला था ?
जाने किसकी याद में ये नमी निकला थी,
वो नहीं थे पास मेरे तब,
शायद उनका ख्याल आया था ?
खयालो से उप्पर अासमाँ निकला था,
चराग़ों को जला कर कोई रोशनी निकला था,
कोई धुंआ भी तो साथ था उनके उप्पर उप्पर,
जब निकला मेरा ज़नाज़ा उनके गली से,
तब जाके उनके लबो से मेरा नाम निकला था ?
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