मैं अपने दर्द पर आँसूओं की पट्टी बांध दिया करता था, कुछ जख्म ऐसे थें जिन्हें ढाँक लिया करता था, वो अफसोस न करें बेमुरब्बत-ए-उतर का, वो आज भी हम हीं हैं, जो कल तक आवाज दिया करता था ।
वो तर्ज़ की आहटों पर अलविदा लिखती हैं, मैं बातों पर उनकी सजदा लिखता हूँ, वक़्त की आँखों में मैं रह ही कहाँ गया था ? ज़माने सजा लिखतें हैं, और मैं कमब्ख़त वफ़ा लिखता हूँ।
दिल-ए-रुखसार की खवाहिश आबरू बन चुकी है,
मोहब्बत होनी थी जिनसे वो अब क़ायनात की माशूक़ बन चुकी है,
हम तो बेवजह ही बदनाम हैं आशिक़ों की बस्ती में,
एक ही घर था मेरा वो भी अब ताबूत बन चुकी है।
लफ्क़ूज़ियत की शराबोर अब शियाशत न कर,
हमने अपनों को खोया है, यहीं किनारें होकर,
नौका-ए-सहारा आजमाइश न कीजिये,
हमने खुद को संभाला है, यहीं खुद को लुटा कर।