वो तर्ज़ की आहटों पर अलविदा लिखती हैं,
मैं बातों पर उनकी सजदा लिखता हूँ,
वक़्त की आँखों में मैं रह ही कहाँ गया था ?
ज़माने सजा लिखतें हैं, और मैं कमब्ख़त वफ़ा लिखता हूँ।
मैं बातों पर उनकी सजदा लिखता हूँ,
वक़्त की आँखों में मैं रह ही कहाँ गया था ?
ज़माने सजा लिखतें हैं, और मैं कमब्ख़त वफ़ा लिखता हूँ।
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