मैं अपने दर्द पर आँसूओं की पट्टी बांध दिया करता था,
कुछ जख्म ऐसे थें जिन्हें ढाँक लिया करता था,
वो अफसोस न करें बेमुरब्बत-ए-उतर का,
वो आज भी हम हीं हैं, जो कल तक आवाज दिया करता था ।
कुछ जख्म ऐसे थें जिन्हें ढाँक लिया करता था,
वो अफसोस न करें बेमुरब्बत-ए-उतर का,
वो आज भी हम हीं हैं, जो कल तक आवाज दिया करता था ।
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